श्री गणेश चालीसा
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श्री गणपति का ध्यान धर, करूँ विनय कर जोड़।
विघ्न विनाशक कृपा करो, संकट देना छोड़॥
जय गणपति गुण ज्ञान निधाना।
प्रथम पूज्य तुम मंगल नाना॥
शिव गौरी के पुत्र दुलारे।
भक्तों के तुम सदा सहारे॥
गजमुख सुंदर रूप तुम्हारा।
देखत मिटे कष्ट सब सारा॥
एकदंत तुम नाम कहाए।
ज्ञान और शुभ बुद्धि दिलाए॥
मूषक वाहन शोभित भारी।
मोदक प्रिय हैं मंगलकारी॥
माथे सिंदूर तिलक मन भावे।
दर्शन से मन शांति पावे॥
चार भुजा में आयुध धारे।
दुष्ट विचार हृदय से टारे॥
एक हाथ में अंकुश सोहे।
दूजे पाश सभी मन मोहे॥
तीजे हाथ मोदक प्यारा।
चौथा देता सुख अपारा॥
लंबोदर हे दीनदयाला।
हरते तुम संकट विकराला॥
रिद्धि-सिद्धि के स्वामी देवा।
जो जन करता निशदिन सेवा॥
उसके घर में मंगल होता।
भाग्य कभी उसका नहीं सोता॥
बुद्धि-विवेक उसे मिल जाता।
सच्चे पथ पर वह चल पाता॥
विद्या चाहें जो नर-नारी।
पूजें तुमको श्रद्धा भारी॥
व्यापारों में वृद्धि कराओ।
निर्धन के भंडार भराओ॥
रुके हुए सब काम बनाते।
भटके जन को राह दिखाते॥
दुखियों के तुम दुख हर लेते।
भक्तों को सुख-संपत्ति देते॥
गणनायक तुम जग रखवाले।
काटो बंधन कठिन निराले॥
वक्रतुंड हे करुणा सागर।
कृपा करो तुम हे रत्नाकर॥
मंगलमूर्ति नाम तुम्हारा।
सारे जग में जय-जयकारा॥
देव सभी पहले तुम्हें मनाते।
तब अपने शुभ काम बनाते॥
ऋषि-मुनि करते ध्यान तुम्हारा।
तुमसे जग में ज्ञान उजियारा॥
बालक तुमको शीश नवाते।
मनचाहा आशीष वे पाते॥
वृद्ध जनों का कष्ट मिटाओ।
रोगी को आरोग्य दिलाओ॥
भय और चिंता दूर भगाओ।
मन में नई उमंग जगाओ॥
क्रोध, लोभ और मोह मिटाना।
मन में प्रेम-भक्ति भर जाना॥
सच्चे मन से नाम जो गावे।
उसका जीवन सफल हो जावे॥
गणपति बप्पा मोरया गाएँ।
घर-आँगन में खुशी मनाएँ॥
भाद्रपद में उत्सव आता।
हर भक्त तुम्हें घर में लाता॥
दूर्वा, पुष्प और मोदक चढ़ते।
श्रद्धा से सब मस्तक धरते॥
दस दिन तक गुणगान तुम्हारा।
गूँजे जग में नाम तुम्हारा॥
विसर्जन में भक्त पुकारें।
जल्दी आना देव हमारे॥
तुम बिन कोई काज न होता।
तुमसे हर शुभ बीज है बोता॥
लेखक, कवि तुमको मनाते।
शुभ विचार और ज्ञान वे पाते॥
विद्यार्थी जो ध्यान लगावे।
परीक्षा में सफलता पावे॥
नौकरी की आस लगाए।
तुम उसकी हर राह बनाए॥
घर में क्लेश अगर बढ़ जावे।
गणपति नाम शांति बरसावे॥
नित्य तुम्हारा ध्यान जो करता।
संकट से वह कभी न डरता॥
हे गणराज कृपा बरसाओ।
भक्तों की नैया पार लगाओ॥
भक्ति भाव मन में भर देना।
सत्य धर्म का मार्ग दिखा देना॥
अंत समय जब प्राण निकलें।
मुख से गणपति नाम ही निकले॥
जय-जय गणपति सिद्धिविनायक।
तुम हो सबके भाग्य विधायक॥
दोहा
गणपति चालीसा जो पढ़े, श्रद्धा सहित लगाय।
विघ्न मिटें और सुख मिले, गणपति कृपा बरसाय
विघ्न विनाशक कृपा करो, संकट देना छोड़॥
जय गणपति गुण ज्ञान निधाना।
प्रथम पूज्य तुम मंगल नाना॥
शिव गौरी के पुत्र दुलारे।
भक्तों के तुम सदा सहारे॥
गजमुख सुंदर रूप तुम्हारा।
देखत मिटे कष्ट सब सारा॥
एकदंत तुम नाम कहाए।
ज्ञान और शुभ बुद्धि दिलाए॥
मूषक वाहन शोभित भारी।
मोदक प्रिय हैं मंगलकारी॥
माथे सिंदूर तिलक मन भावे।
दर्शन से मन शांति पावे॥
चार भुजा में आयुध धारे।
दुष्ट विचार हृदय से टारे॥
एक हाथ में अंकुश सोहे।
दूजे पाश सभी मन मोहे॥
तीजे हाथ मोदक प्यारा।
चौथा देता सुख अपारा॥
लंबोदर हे दीनदयाला।
हरते तुम संकट विकराला॥
रिद्धि-सिद्धि के स्वामी देवा।
जो जन करता निशदिन सेवा॥
उसके घर में मंगल होता।
भाग्य कभी उसका नहीं सोता॥
बुद्धि-विवेक उसे मिल जाता।
सच्चे पथ पर वह चल पाता॥
विद्या चाहें जो नर-नारी।
पूजें तुमको श्रद्धा भारी॥
व्यापारों में वृद्धि कराओ।
निर्धन के भंडार भराओ॥
रुके हुए सब काम बनाते।
भटके जन को राह दिखाते॥
दुखियों के तुम दुख हर लेते।
भक्तों को सुख-संपत्ति देते॥
गणनायक तुम जग रखवाले।
काटो बंधन कठिन निराले॥
वक्रतुंड हे करुणा सागर।
कृपा करो तुम हे रत्नाकर॥
मंगलमूर्ति नाम तुम्हारा।
सारे जग में जय-जयकारा॥
देव सभी पहले तुम्हें मनाते।
तब अपने शुभ काम बनाते॥
ऋषि-मुनि करते ध्यान तुम्हारा।
तुमसे जग में ज्ञान उजियारा॥
बालक तुमको शीश नवाते।
मनचाहा आशीष वे पाते॥
वृद्ध जनों का कष्ट मिटाओ।
रोगी को आरोग्य दिलाओ॥
भय और चिंता दूर भगाओ।
मन में नई उमंग जगाओ॥
क्रोध, लोभ और मोह मिटाना।
मन में प्रेम-भक्ति भर जाना॥
सच्चे मन से नाम जो गावे।
उसका जीवन सफल हो जावे॥
गणपति बप्पा मोरया गाएँ।
घर-आँगन में खुशी मनाएँ॥
भाद्रपद में उत्सव आता।
हर भक्त तुम्हें घर में लाता॥
दूर्वा, पुष्प और मोदक चढ़ते।
श्रद्धा से सब मस्तक धरते॥
दस दिन तक गुणगान तुम्हारा।
गूँजे जग में नाम तुम्हारा॥
विसर्जन में भक्त पुकारें।
जल्दी आना देव हमारे॥
तुम बिन कोई काज न होता।
तुमसे हर शुभ बीज है बोता॥
लेखक, कवि तुमको मनाते।
शुभ विचार और ज्ञान वे पाते॥
विद्यार्थी जो ध्यान लगावे।
परीक्षा में सफलता पावे॥
नौकरी की आस लगाए।
तुम उसकी हर राह बनाए॥
घर में क्लेश अगर बढ़ जावे।
गणपति नाम शांति बरसावे॥
नित्य तुम्हारा ध्यान जो करता।
संकट से वह कभी न डरता॥
हे गणराज कृपा बरसाओ।
भक्तों की नैया पार लगाओ॥
भक्ति भाव मन में भर देना।
सत्य धर्म का मार्ग दिखा देना॥
अंत समय जब प्राण निकलें।
मुख से गणपति नाम ही निकले॥
जय-जय गणपति सिद्धिविनायक।
तुम हो सबके भाग्य विधायक॥
दोहा
गणपति चालीसा जो पढ़े, श्रद्धा सहित लगाय।
विघ्न मिटें और सुख मिले, गणपति कृपा बरसाय